श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.49

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

नैते गुणा न गुणिनो महदादयो ये

सर्वे मनःप्रभृतयः सहदेवमर्त्याः।

आद्यन्तवन्त उरुगाय विदन्ति हि त्वा-

मेवं विमृश्य सुधियो विरमन्ति शब्दात्॥ ४९

naite guṇā na guṇino mahadādayo ye

sarve manaḥprabhṛtayaḥ sahadevamartyāḥ|

ādyantavanta urugāya vidanti hi tvā-

mevaṃ vimṛśya sudhiyo viramanti śabdāt|| 49

अर्थ

समग्र कीर्तिके आश्रय भगवन्! ये सत्त्वादि गुण और इन गुणोंके परिणाम महत्तत्त्वादि, देवता, मनुष्य एवं मन आदि कोई भी आपका स्वरूप जाननेमें समर्थ नहीं है; क्योंकि ये सब आदि-अन्तवाले हैं और आप अनादि एवं अनन्त हैं। ऐसा विचार करके ज्ञानीजन शब्दोंकी मायासे उपरत हो जाते हैं॥ ४९॥

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