श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.44

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

प्रायेण देव मुनयः स्वविमुक्तिकामा

मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः।

नैतान्विहाय कृपणान्विमुमुक्ष एको

नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये॥ ४४

prāyeṇa deva munayaḥ svavimuktikāmā

maunaṃ caranti vijane na parārthaniṣṭhāḥ|

naitānvihāya kṛpaṇānvimumukṣa eko

nānyaṃ tvadasya śaraṇaṃ bhramato'nupaśye|| 44

अर्थ

मेरे स्वामी! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तो प्रायः अपनी मुक्तिके लिये निर्जन वनमें जाकर मौनव्रत धारण कर लेते हैं। वे दूसरोंकी भलाईके लिये कोई विशेष प्रयत्न नहीं करते। परन्तु मेरी दशा तो दूसरी ही हो रही है। मैं इन भूले हुए असहाय गरीबोंको छोड़कर अकेला मुक्त होना नहीं चाहता। और इन भटकते हुए प्राणियोंके लिये आपके सिवा और कोई सहारा भी नहीं दिखायी पड़ता॥ ४४॥

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