श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.40

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

जिह्वैकतोऽच्युत विकर्षति मावितृप्ता

शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित्।

घ्राणोऽन्यतश्‍चपलदृक् क्‍व च कर्मशक्ति-

र्बह्व्यः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति॥ ४०✎ 2023

jihvaikato'cyuta vikarṣati māvitṛptā

śiśno'nyatastvagudaraṃ śravaṇaṃ kutaścit|

ghrāṇo'nyataścapaladṛk kva ca karmaśakti-

rbahvyaḥ sapatnya iva gehapatiṃ lunanti|| 40

अर्थ

अच्युत! यह कभी न अघानेवाली जीभ मुझे स्वादिष्ट रसोंकी ओर खींचती रहती है। जननेन्द्रिय सुन्दरी स्त्रीकी ओर, त्वचा सुकोमल स्पर्शकी ओर, पेट भोजनकी ओर, कान मधुर संगीतकी ओर, नासिका भीनी-भीनी सुगन्धकी ओर और ये चपल नेत्र सौन्दर्यकी ओर मुझे खींचते रहते हैं। इनके सिवा कर्मेन्द्रियाँ भी अपने-अपने विषयोंकी ओर ले जानेको जोर लगाती ही रहती हैं। मेरी तो वह दशा हो रही है, जैसे किसी पुरुषकी बहुत-सी पत्नियाँ उसे अपने-अपने शयनगृहमें ले जानेके लिये चारों ओरसे घसीट रही हों॥ ४०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2023 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): र्बह्वॺ: सप → र्बह्व्यः सप

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