श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.31

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो

माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था।

यद् यस्य जन्म निधनं स्थितिरीक्षणं च

तद् वै तदेव वसुकालवदष्टितर्वोः॥ ३१

tvaṃ vā idaṃ sadasadīśa bhavāṃstato'nyo

māyā yadātmaparabuddhiriyaṃ hyapārthā|

yad yasya janma nidhanaṃ sthitirīkṣaṇaṃ ca

tad vai tadeva vasukālavadaṣṭitarvoḥ|| 31

अर्थ

भगवन्! यह जो कुछ कार्य-कारणके रूपमें प्रतीत हो रहा है, वह सब आप ही हैं और इससे भिन्‍न भी आप ही हैं। अपने-परायेका भेद-भाव तो अर्थहीन शब्दोंकी माया है; क्योंकि जिससे जिसका जन्म, स्थिति, लय और प्रकाश होता है, वह उसका स्वरूप ही होता है—जैसे बीज और वृक्ष कारण और कार्यकी दृष्टिसे भिन्‍न-भिन्‍न हैं, तो भी गन्ध-तन्मात्रकी दृष्टिसे दोनों एक ही हैं॥ ३१॥

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