श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.28

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एवं जनं निपतितं प्रभवाहिकूपे

कामाभिकाममनु यः प्रपतन्प्रसङ्गात्।

कृत्वाऽऽत्मसात् सुरर्षिणा भगवन् गृहीतः ✎ 1878

सोऽहं कथं नु विसृजे तव भृत्यसेवाम्॥ २८

evaṃ janaṃ nipatitaṃ prabhavāhikūpe

kāmābhikāmamanu yaḥ prapatanprasaṅgāt|

kṛtvā''tmasāt surarṣiṇā bhagavan gṛhītaḥ

so'haṃ kathaṃ nu visṛje tava bhṛtyasevām|| 28

अर्थ

भगवन्! यह संसार एक ऐसा अँधेरा कुआँ है, जिसमें कालरूप सर्प डँसनेके लिये सदा तैयार रहता है। विषय-भोगोंकी इच्छावाले पुरुष उसीमें गिरे हुए हैं। मैं भी संगवश उसके पीछे उसीमें गिरने जा रहा था। परन्तु भगवन्! देवर्षि नारदने मुझे अपनाकर बचा लिया। तब भला, मैं आपके भक्तजनोंकी सेवा कैसे छोड़ सकता हूँ॥ २८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1878 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ऽऽत्मसात्सुरर्षिणा → ऽऽत्मसात् सुरर्षिणा

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