॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.19
बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह
नार्तस्य चागदमुदन्वति मञ्जतो नौः।
तप्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहाज्जसेष्ट-
स्तावद् विभो तनुभृतां त्वदुपेक्षितानाम्॥ १९
bālasya neha śaraṇaṃ pitarau nṛsiṃha
nārtasya cāgadamudanvati mañjato nauḥ|
taptasya tatpratividhirya ihājjaseṣṭa-
stāvad vibho tanubhṛtāṃ tvadupekṣitānām|| 19
अर्थ
भगवान् नृसिंह! इस लोकमें दुःखी जीवोंका दुःख मिटानेके लिये जो उपाय माना जाता है, वह आपके उपेक्षा करनेपर एक क्षणके लिये ही होता है। यहाँतक कि मा-बाप बालककी रक्षा नहीं कर सकते, ओषधि रोग नहीं मिटा सकती और समुद्रमें डूबते हुएको नौका नहीं बचा सकती॥ १९॥