श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.16

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

त्रस्तोऽस्म्यहं१ कृपणवत्सल दुःसहोग्र-

संसारचक्रकदनाद्२ ग्रसतां प्रणीतः।

बद्धः स्वकर्मभिरुशत्तम तेऽङ्‌घ्रिमूलं

प्रीतोऽपवर्गशरणं ह्वयसे कदा नु॥ १६

trasto'smyahaṃ kṛpaṇavatsala duḥsahogra-

saṃsāracakrakadanād grasatāṃ praṇītaḥ|

baddhaḥ svakarmabhiruśattama te'ṅghrimūlaṃ

prīto'pavargaśaraṇaṃ hvayase kadā nu|| 16

अर्थ

दीनबन्धो! मैं भयभीत हूँ तो केवल इस असह्य और उग्र संसारचक्रमें पिसनेसे। मैं अपने कर्मपाशोंसे बँधकर इन भयंकर जन्तुओंके बीचमें डाल दिया गया हूँ। मेरे स्वामी! आप प्रसन्‍न होकर मुझे कब अपने उन चरणकमलोंमें बुलायेंगे, जो समस्त जीवोंकी एकमात्र शरण और मोक्षस्वरूप हैं?॥ १६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—स्‍म्यलं।

    (मुद्रित पृष्ठ 859)
  2. २

    प्रा० पा०—गहनाद्।

    (मुद्रित पृष्ठ 859)

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