श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.49

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

प्रजापतय ऊचुः

प्रजेशा वयं ते परेशाभिसृष्टा

न येन प्रजा वै सृजामो निषिद्धाः।

स एष त्वया भिन्‍नवक्षा नु शेते

जगन्मङ्गलं सत्त्वमूर्तेऽवतारः॥ ४९

prajeśā vayaṃ te pareśābhisṛṣṭā

na yena prajā vai sṛjāmo niṣiddhāḥ|

sa eṣa tvayā bhinnavakṣā nu śete

jaganmaṅgalaṃ sattvamūrte'vatāraḥ|| 49

अर्थ

प्रजापतियोंने कहा—परमेश्‍वर! आपने हमें प्रजापति बनाया था। परन्तु इसके रोक देनेसे हम प्रजाकी सृष्टि नहीं कर पाते थे। आपने इसकी छाती फाड़ डाली और यह जमीनपर सर्वदाके लिये सो गया। सत्त्वमय मूर्ति धारण करनेवाले प्रभो! आपका यह अवतार संसारके कल्याणके लिये है॥ ४९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें