श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.46

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

विद्याधरा ऊचुः

विद्यां पृथग्धारणयानुराद्धां२

न्यषेधदज्ञो बलवीर्यदृप्तः।

स येन संख्ये पशुवद्धतस्तं

मायानृसिंहं प्रणताः स्म नित्यम्॥ ४६

vidyāṃ pṛthagdhāraṇayānurāddhāṃ

nyaṣedhadajño balavīryadṛptaḥ|

sa yena saṃkhye paśuvaddhatastaṃ

māyānṛsiṃhaṃ praṇatāḥ sma nityam|| 46

अर्थ

विद्याधरोंने कहा—यह मूर्ख हिरण्यकशिपु अपने बल और वीरताके घमंडमें चूर था। यहाँतक कि हम लोगोंने विविध धारणाओंसे जो विद्या प्राप्त की थी, उसे इसने व्यर्थ कर दिया था। आपने युद्धमें यज्ञपशुकी तरह इसको नष्ट कर दिया। अपनी लीलासे नृसिंह बने हुए आपको हम नित्य-निरन्तर प्रणाम करते हैं॥ ४६॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—नुरुद्धां।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 854)

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