श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.30

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

संरम्भदुष्प्रेक्ष्यकराललोचनो

व्यात्ताननान्तं विलिहन्स्वजिह्वया।

असृग्लवाक्तारुणकेसराननो

यथान्त्रमाली द्विपहत्यया हरिः॥ ३०

saṃrambhaduṣprekṣyakarālalocano

vyāttānanāntaṃ vilihansvajihvayā|

asṛglavāktāruṇakesarānano

yathāntramālī dvipahatyayā hariḥ|| 30

अर्थ

उस समय उनकी क्रोधसे भरी विकराल आँखोंकी ओर देखा नहीं जाता था। वे अपनी लपलपाती हुई जीभसे फैले हुए मुँहके दोनों कोने चाट रहे थे। खूनके छींटोंसे उनका मुँह और गरदनके बाल लाल हो रहे थे। हाथीको मारकर गलेमें आँतोंकी माला पहने हुए मृगराजके समान उनकी शोभा हो रही थी॥ ३०॥✎ 613 614

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #613 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #614 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर

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