श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.25

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

न तद् विचित्रं खलु सत्त्वधामनि

स्वतेजसा यो नु पुरापिबत् तमः।

ततोऽभिपद्याभ्यहनन्महासुरो

रुषा नृसिंहं गदयोरुवेगया॥ २५

na tad vicitraṃ khalu sattvadhāmani

svatejasā yo nu purāpibat tamaḥ|

tato'bhipadyābhyahananmahāsuro

ruṣā nṛsiṃhaṃ gadayoruvegayā|| 25

अर्थ

समस्त शक्ति और तेजके आश्रय भगवान्‌के सम्बन्धमें ऐसी घटना कोई आश्‍चर्यजनक नहीं है; क्योंकि सृष्टिके प्रारम्भमें उन्होंने अपने तेजसे प्रलयके निमित्तभूत तमोगुणरूपी घोर अन्धकारको भी पी लिया था। तदनन्तर वह दैत्य बड़े क्रोधसे लपका और अपनी गदाको बड़े जोरसे घुमाकर उसने नृसिंहभगवान्‌पर प्रहार किया॥ २५॥✎ 608 609 610 611 612

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #608 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #609 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #610 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #611 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #612 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् पर → नृसिंहभगवान्‌पर

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