श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.17

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

स१ विक्रमन् पुत्रवधेप्सुरोजसा

निशम्य निर्ह्रादमपूर्वमद‍्भुतम्।

अन्तःसभायां न ददर्श तत्पदं

वितत्रसुर्येन२ सुरारियूथपाः॥ १७

sa vikraman putravadhepsurojasā

niśamya nirhrādamapūrvamadbhutam|

antaḥsabhāyāṃ na dadarśa tatpadaṃ

vitatrasuryena surāriyūthapāḥ|| 17

अर्थ

हिरण्यकशिपु प्रह्लादको मार डालनेके लिये बड़े जोरसे झपटा था; परन्तु दैत्यसेनापतियोंको भी भयसे कँपा देनेवाले उस अद्भुत और अपूर्व घोर शब्दको सुनकर वह घबराया हुआ-सा देखने लगा कि यह शब्द करनेवाला कौन है? परन्तु उसे सभाके भीतर कुछ भी दिखायी न पड़ा॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सोऽतिक्रमन्।

    (मुद्रित पृष्ठ 849)
  2. २

    प्रा० पा०—सुस्तत्र।

    (मुद्रित पृष्ठ 849)

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