श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.7

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

मुग्धस्य बाल्ये कौमारे क्रीडतो याति विंशतिः।

जरया ग्रस्तदेहस्य यात्यकल्पस्य विंशतिः॥ ७

mugdhasya bālye kaumāre krīḍato yāti viṃśatiḥ|

jarayā grastadehasya yātyakalpasya viṃśatiḥ|| 7

अर्थ

बचपनमें उन्हें अपने हित-अहितका ज्ञान नहीं रहता, कुछ बड़े होनेपर कुमार अवस्थामें वे खेल-कूदमें लग जाते हैं। इस प्रकार बीस वर्षका तो पता ही नहीं चलता। जब बुढ़ापा शरीरको ग्रस लेता है, तब अन्तके बीस वर्षोंमें कुछ करने-धरनेकी शक्ति ही नहीं रह जाती॥ ७॥

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