भाइयो! जो इस प्रकार अपने कुटुम्बियोंके पेट पालनेमें ही लगा रहता है—कभी भगवद्भजन नहीं करता—वह विद्वान् हो, तो भी उसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। क्योंकि अपने-परायेका भेद-भाव रहनेके कारण उसे भी अज्ञानियोंके समान ही तमःप्रधान गति प्राप्त होती है॥ १६॥✎ 1988
विद्वानपीत्थं दनुजाः कुटुम्बं
पुष्णन्स्वलोकाय न कल्पते वै ।
यः स्वीयपारक्यविभिन्नभाव-
स्तमः प्रपद्येत यथा विमूढः॥ १६
भाइयो! जो इस प्रकार अपने कुटुम्बियोंके पेट पालनेमें ही लगा रहता है—कभी भगवद्भजन नहीं करता—वह विद्वान् हो, तो भी उसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। क्योंकि अपने-परायेका भेद-भाव रहनेके कारण उसे भी अज्ञानियोंके समान ही तमःप्रधान गति प्राप्त होती है॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.6.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 838) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/6/16/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—यत्स्वी०।
(मुद्रित पृष्ठ 838)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1988 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): गवाँ → गँवा