श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.10

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

कोन्वर्थतृष्णां विसृजेत् प्राणेभ्योऽपि य ईप्सितः।

यं क्रीणात्यसुभिः प्रेष्ठैस्तस्करः सेवको वणिक्॥ १०

konvarthatṛṣṇāṃ visṛjet prāṇebhyo'pi ya īpsitaḥ|

yaṃ krīṇātyasubhiḥ preṣṭhaistaskaraḥ sevako vaṇik|| 10

अर्थ

जिसे चोर, सेवक एवं व्यापारी अपने अत्यन्त प्यारे प्राणोंकी भी बाजी लगाकर संग्रह करते हैं और इसलिये उन्हें जो प्राणोंसे भी अधिक वांछनीय है—उस धनकी तृष्णाको भला कौन त्याग सकता है॥ १०॥

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