श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.8

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

गृहमानीतमाहूय प्रह्रादं दैत्ययाजकाः।

प्रशस्य श्लक्ष्णया वाचा समपृच्छन्त सामभिः॥ ८

gṛhamānītamāhūya prahrādaṃ daityayājakāḥ|

praśasya ślakṣṇayā vācā samapṛcchanta sāmabhiḥ|| 8

अर्थ

जब दैत्योंने प्रह्लादको गुरुजीके घर पहुँचा दिया, तब पुरोहितोंने उनको बहुत पुचकारकर और फुसलाकर बड़ी मधुर वाणीसे पूछा॥ ८॥

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