जब दैत्योंने प्रह्लादको गुरुजीके घर पहुँचा दिया, तब पुरोहितोंने उनको बहुत पुचकारकर और फुसलाकर बड़ी मधुर वाणीसे पूछा॥ ८॥
गृहमानीतमाहूय प्रह्रादं दैत्ययाजकाः।
प्रशस्य श्लक्ष्णया वाचा समपृच्छन्त सामभिः॥ ८
जब दैत्योंने प्रह्लादको गुरुजीके घर पहुँचा दिया, तब पुरोहितोंने उनको बहुत पुचकारकर और फुसलाकर बड़ी मधुर वाणीसे पूछा॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 829) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/5/8/