युधिष्ठिर! इसके बाद पुरोहित उन्हें लेकर पाठशालामें गये और क्रमशः धर्म, अर्थ और काम—इन तीन पुरुषार्थोंकी शिक्षा देने लगे। प्रह्लाद वहाँ अत्यन्त नम्र सेवककी भाँति रहते थे॥ ५२॥
धर्ममर्थं च कामं च नितरां चानुपूर्वशः।
प्रह्रादायोचतू राजन् प्रश्रितावनताय च॥ ५२
युधिष्ठिर! इसके बाद पुरोहित उन्हें लेकर पाठशालामें गये और क्रमशः धर्म, अर्थ और काम—इन तीन पुरुषार्थोंकी शिक्षा देने लगे। प्रह्लाद वहाँ अत्यन्त नम्र सेवककी भाँति रहते थे॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 835) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/5/52/