॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.5.46
वर्तमानोऽविदूरे वै बालोऽप्यजडधीरयम्।
न विस्मरति मेऽनार्यं शुनःशेप इव प्रभुः॥ ४६
vartamāno'vidūre vai bālo'pyajaḍadhīrayam|
na vismarati me'nāryaṃ śunaḥśepa iva prabhuḥ|| 46
अर्थ
यह बालक होनेपर भी समझदार है और मेरे पास ही निःशंक भावसे रहता है। हो-न-हो इसमें कुछ सामर्थ्य अवश्य है। जैसे शुनःशेप* अपने पिताकी करतूतोंसे उसका विरोधी हो गया था, वैसे ही यह भी मेरे किये अपकारोंको न भूलेगा॥ ४६॥
टिप्पणियाँ
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शुनःशेप अजीगर्तका मँझला पुत्र था। उसे पिताने वरुणके यज्ञमें बलि देनेके लिये हरिश्चन्द्रके पुत्र रोहिताश्वके हाथ बेच दिया था तब उसके मामा विश्वामित्रजीने उसकी रक्षा की; और वह अपने पितासे विरुद्ध होकर उनके विपक्षी विश्वामित्रजीके ही गोत्रमें हो गया। यह कथा आगे ‘नवम स्कन्ध’ के सातवें अध्यायमें आवेगी।