श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.44

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

हिमवाय्वग्‍निसलिलैः पर्वताक्रमणैरपि।

न शशाक यदा हन्तुमपापमसुरः सुतम्।

चिन्तां दीर्घतमां प्राप्तस्तत्कर्तुं नाभ्यपद्यत॥ ४४

himavāyvagnisalilaiḥ parvatākramaṇairapi|

na śaśāka yadā hantumapāpamasuraḥ sutam|

cintāṃ dīrghatamāṃ prāptastatkartuṃ nābhyapadyata|| 44

अर्थ

बर्फीली जगह, दहकती हुई आग और समुद्रमें बारी-बारीसे डलवाया, आँधीमें छोड़ दिया तथा पर्वतोंके नीचे दबवा दिया; परन्तु इनमेंसे किसी भी उपायसे वह अपने पुत्र निष्पाप प्रह्लादका बाल भी बाँका न कर सका। अपनी विवशता देखकर हिरण्यकशिपुको बड़ी चिन्ता हुई। उसे प्रह्लादको मारनेके लिये और कोई उपाय नहीं सूझ पड़ा॥ ४४॥

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