॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.5.41
परे ब्रह्मण्यनिर्देश्ये भगवत्यखिलात्मनि।
युक्तात्मन्यफला आसन्नपुण्यस्येव सत्क्रियाः॥ ४१
pare brahmaṇyanirdeśye bhagavatyakhilātmani|
yuktātmanyaphalā āsannapuṇyasyeva satkriyāḥ|| 41
अर्थ
उस समय प्रह्लादजीका चित्त उन परमात्मामें लगा हुआ था, जो मन-वाणीके अगोचर, सर्वात्मा, समस्त शक्तियोंके आधार एवं परब्रह्म हैं। इसलिये उनके सारे प्रहार ठीक वैसे ही निष्फल हो गये, जैसे भाग्यहीनोंके बड़े-बड़े उद्योग-धंधे व्यर्थ होते हैं॥ ४१॥