॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.5.32
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं
निष्किञ्चनानां१ न वृणीत यावत्॥ ३२
naiṣāṃ matistāvadurukramāṅghriṃ
spṛśatyanarthāpagamo yadarthaḥ|
mahīyasāṃ pādarajo'bhiṣekaṃ
niṣkiñcanānāṃ na vṛṇīta yāvat|| 32
अर्थ
जिनकी बुद्धि भगवान्के चरणकमलोंका स्पर्श कर लेती है, उनके जन्म-मृत्युरूप अनर्थका सर्वथा नाश हो जाता है। परन्तु जो लोग अकिंचन भगवत्प्रेमी महात्माओंके चरणोंकी धूलमें स्नान नहीं कर लेते, उनकी बुद्धि काम्यकर्मोंका पूरा सेवन करनेपर भी भगवच्चरणोंका स्पर्श नहीं कर सकती॥ ३२॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—नानामवृणीत।