अब वह नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानोंके सौन्दर्यसे युक्त स्वर्गमें ही रहने लगा था। स्वयं विश्वकर्माका बनाया हुआ इन्द्रका भवन ही उसका निवासस्थान था। उस भवनमें तीनों लोकोंका सौन्दर्य मूर्तिमान् होकर निवास करता था। वह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे सम्पन्न था॥ ८॥✎ 5812021
देवोद्यानश्रिया जुष्टमध्यास्ते स्म त्रिविष्टपम्।
महेन्द्रभवनं साक्षान्निर्मितं विश्वकर्मणा।
त्रैलोक्यलक्ष्म्यायतनमध्युवासाखिलर्द्धिमत्॥ ८
अब वह नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानोंके सौन्दर्यसे युक्त स्वर्गमें ही रहने लगा था। स्वयं विश्वकर्माका बनाया हुआ इन्द्रका भवन ही उसका निवासस्थान था। उस भवनमें तीनों लोकोंका सौन्दर्य मूर्तिमान् होकर निवास करता था। वह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे सम्पन्न था॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 823) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/4/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)