श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.42

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स उत्तमश्लोकपदारविन्दयो-

र्निषेवयाकिञ्चनसङ्गलब्धया ।

तन्वन् परां निर्वृतिमात्मनो मुहु-

र्दुःसङ्गदीनान्यमनःशमं व्यधात्॥ ४२

sa uttamaślokapadāravindayo-

rniṣevayākiñcanasaṅgalabdhayā |

tanvan parāṃ nirvṛtimātmano muhu-

rduḥsaṅgadīnānyamanaḥśamaṃ vyadhāt|| 42

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी यह भक्ति अकिंचन भगवत्प्रेमी महात्माओंके संगसे ही प्राप्त होती है। इसके द्वारा वे स्वयं तो परमानन्दमें मग्न रहते ही थे; जिन बेचारोंका मन कुसंगके कारण अत्यन्त दीन-हीन हो रहा था, उन्हें भी बार-बार शान्ति प्रदान करते थे॥ ४२॥

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