श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.33

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

नोद्विग्नचित्तो व्यसनेषु निःस्पृहः

श्रुतेषु दृष्टेषु गुणेष्ववस्तुदृक्।

दान्तेन्द्रियप्राणशरीरधीः सदा

प्रशान्तकामो रहितासुरोऽसुरः॥ ३३

nodvignacitto vyasaneṣu niḥspṛhaḥ

śruteṣu dṛṣṭeṣu guṇeṣvavastudṛk|

dāntendriyaprāṇaśarīradhīḥ sadā

praśāntakāmo rahitāsuro'suraḥ|| 33

अर्थ

बड़े-बड़े दुःखोंमें भी वे तनिक भी घबराते न थे। लोक-परलोकके विषयोंको उन्होंने देखा-सुना तो बहुत था, परन्तु वे उन्हें निःसार और असत्य समझते थे। इसलिये उनके मनमें किसी भी वस्तुकी लालसा न थी। इन्द्रिय, प्राण, शरीर और मन उनके वशमें थे। उनके चित्तमें कभी किसी प्रकारकी कामना नहीं उठती थी। जन्मसे असुर होनेपर भी उनमें आसुरी सम्पत्तिका लेश भी नहीं था॥ ३३॥

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