युधिष्ठिर! दैत्यराज हिरण्यकशिपुके बड़े ही विलक्षण चार पुत्र थे। उनमें प्रह्लाद यों तो सबसे छोटे थे, परन्तु गुणोंमें सबसे बड़े थे। वे बड़े संतसेवी थे॥ ३०॥
तस्य दैत्यपतेः पुत्राश्चत्वारः परमाद्भुताः।
प्रह्रादोऽभून्महांस्तेषां गुणैर्महदुपासकः॥ ३०
युधिष्ठिर! दैत्यराज हिरण्यकशिपुके बड़े ही विलक्षण चार पुत्र थे। उनमें प्रह्लाद यों तो सबसे छोटे थे, परन्तु गुणोंमें सबसे बड़े थे। वे बड़े संतसेवी थे॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 826) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/4/30/