युधिष्ठिर! इस रूपमें भी वह भगवान्का वही पार्षद है, जिसे सनकादिकोंने शाप दिया था। वह ऐश्वर्यके मदसे मतवाला हो रहा था तथा घमंडमें चूर होकर शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लंघन कर रहा था। देखते-ही-देखते उसके जीवनका बहुत-सा समय बीत गया॥ २०॥✎ 582583
एवमैश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः।
कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापमुपेयुषः॥ २०
युधिष्ठिर! इस रूपमें भी वह भगवान्का वही पार्षद है, जिसे सनकादिकोंने शाप दिया था। वह ऐश्वर्यके मदसे मतवाला हो रहा था तथा घमंडमें चूर होकर शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लंघन कर रहा था। देखते-ही-देखते उसके जीवनका बहुत-सा समय बीत गया॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 825) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/4/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)