श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.13

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना

विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः ।

उपासतोपायनपाणिभिर्विना

त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम्॥ १३

tamaṅga mattaṃ madhunorugandhinā

vivṛttatāmrākṣamaśeṣadhiṣṇyapāḥ |

upāsatopāyanapāṇibhirvinā

tribhistapoyogabalaujasāṃ padam|| 13

अर्थ

युधिष्ठिर! वह उत्कट गन्धवाली मदिरा पीकर मतवाला रहा करता था। उसकी आँखें लाल-लाल और चढ़ी हुई रहतीं। उस समय तपस्या, योग, शारीरिक और मानसिक बलका वह भंडार था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके सिवा और सभी देवता अपने हाथोंमें भेंट ले-लेकर उसकी सेवामें लगे रहते॥ १३॥

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