श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.7

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

दैत्येन्द्रतपसा तप्ता दिवि स्थातुं न शक्नुमः।

तस्य चोपशमं भूमन् विधेहि यदि मन्यसे।

लोका न यावन्‍नङ्क्ष्यन्ति बलिहारास्तवा१भिभूः॥ ७

daityendratapasā taptā divi sthātuṃ na śaknumaḥ|

tasya copaśamaṃ bhūman vidhehi yadi manyase|

lokā na yāvannaṅkṣyanti balihārāstavābhibhūḥ|| 7

अर्थ

हिरण्यकशिपुकी उस तपोमयी आगकी लपटोंसे स्वर्गके देवता भी जलने लगे। वे घबराकर स्वर्गसे ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीसे प्रार्थना करने लगे—‘हे देवताओंके भी आराध्यदेव जगत्पति ब्रह्माजी! हमलोग हिरण्यकशिपुके तपकी ज्वालासे जल रहे हैं। अब हम स्वर्गमें नहीं रह सकते। हे अनन्त! हे सर्वाध्यक्ष! यदि आप उचित समझें तो अपनी सेवा करनेवाली जनताका नाश होनेके पहले ही यह ज्वाला शान्त कर दीजिये॥ ६-७॥

यह अर्थ श्लोक 6–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—स्तथा विभो।

    (मुद्रित पृष्ठ 819)

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