श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.35

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यदि दास्यस्यभिमतान् वरान्मे वरदोत्तम।

भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टेभ्यो मृत्युर्मा भून्मम प्रभो॥ ३५

yadi dāsyasyabhimatān varānme varadottama|

bhūtebhyastvadvisṛṣṭebhyo mṛtyurmā bhūnmama prabho|| 35

अर्थ

प्रभो! आप समस्त वरदाताओंमें श्रेष्ठ हैं। यदि आप मुझे अभीष्ट वर देना चाहते हैं, तो ऐसा वर दीजिये कि आपके बनाये हुए किसी भी प्राणीसे—चाहे वह मनुष्य हो या पशु, प्राणी हो या अप्राणी, देवता हो या दैत्य अथवा नागादि किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। भीतर-बाहर, दिनमें, रात्रिमें, आपके बनाये प्राणियोंके अतिरिक्त और भी किसी जीवसे, अस्त्र-शस्त्रसे, पृथ्वी या आकाशमें—कहीं भी मेरी मृत्यु न हो। युद्धमें कोई मेरा सामना न कर सके। मैं समस्त प्राणियोंका एकच्छत्र सम्राट् होऊँ॥ ३५—३७॥

यह अर्थ श्लोक 35–37 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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