श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.10

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तदहं वर्धमानेन तपोयोगसमाधिना।

कालात्मनोश्‍च नित्यत्वात्साधयिष्ये तथाऽऽत्मनः॥ १०

tadahaṃ vardhamānena tapoyogasamādhinā|

kālātmanośca nityatvātsādhayiṣye tathā''tmanaḥ|| 10

अर्थ

भगवन्! आप सब कुछ जानते ही हैं, फिर भी हम अपनी ओरसे आपसे यह निवेदन कर देते हैं कि वह किस अभिप्रायसे यह घोर तपस्या कर रहा है। सुनिये, उसका विचार है कि ‘जैसे ब्रह्माजी अपनी तपस्या और योगके प्रभावसे इस चराचर जगत‍्की सृष्टि करके सब लोकोंसे ऊपर सत्यलोकमें विराजते हैं, वैसे ही मैं भी अपनी उग्र तपस्या और योगके प्रभावसे वही पद और स्थान प्राप्त कर लूँगा। क्योंकि समय असीम है और आत्मा नित्य है। एक जन्ममें नहीं, अनेक जन्म; एक युगमें न सही, अनेक युगोंमें॥ ८—१०॥

यह अर्थ श्लोक 8–10 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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