॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.3.1
अथ तृतीयोऽध्यायः
हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति
नारद उवाच
हिरण्यकशिपू राजन्नजेयमजरामरम्।
आत्मानमप्रतिद्वन्द्वमेकराजं व्यधित्सत॥ १
hiraṇyakaśipū rājannajeyamajarāmaram|
ātmānamapratidvandvamekarājaṃ vyadhitsata|| 1
अर्थ
नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! अब हिरण्यकशिपुने यह विचार किया कि ‘मैं अजेय, अजर, अमर और संसारका एकछत्र सम्राट् बन जाऊँ, जिससे कोई मेरे सामने खड़ातक न हो सके’॥ १॥