श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.8

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

मच्छूलभिन्‍नग्रीवस्य भूरिणा रुधिरेण वै।

रुधिरप्रियं तर्पयिष्ये भ्रातरं मे गतव्यथः॥ ८

macchūlabhinnagrīvasya bhūriṇā rudhireṇa vai|

rudhirapriyaṃ tarpayiṣye bhrātaraṃ me gatavyathaḥ|| 8

अर्थ

अब मैं अपने इस शूलसे उसका गला काट डालूँगा और उसके खूनकी धारासे अपने रुधिरप्रेमी भाईका तर्पण करूँगा। तब कहीं मेरे हृदयकी पीड़ा शान्त होगी॥ ८॥

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