मूर्ख रानियो! तुम्हारी भी यही दशा होनेवाली है। तुम्हें अपनी मृत्यु तो दीखती नहीं और इसके लिये रो-पीट रही हो! यदि तुमलोग सौ बरसतक इसी तरह शोकवश छाती पीटती रहो, तो भी अब तुम इसे नहीं पा सकोगी॥ ५७॥✎ 2020
एवं यूयमपश्यन्त्य आत्मापायमबुद्धयः।
नैनं प्राप्स्यथ शोचन्त्यः पतिं वर्षशतैरपि॥ ५७
मूर्ख रानियो! तुम्हारी भी यही दशा होनेवाली है। तुम्हें अपनी मृत्यु तो दीखती नहीं और इसके लिये रो-पीट रही हो! यदि तुमलोग सौ बरसतक इसी तरह शोकवश छाती पीटती रहो, तो भी अब तुम इसे नहीं पा सकोगी॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 817) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/2/57/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)