कालवश वह जालके फंदोंमें फँस गयी। नर पक्षीको अपनी मादाकी विपत्तिको देखकर बड़ा दुःख हुआ। वह बेचारा उसे छुड़ा तो सकता न था, स्नेहसे उस बेचारीके लिये विलाप करने लगा॥ ५२॥✎ 2020
सासज्जत शिचस्तन्त्यां महिषी कालयन्त्रिता।
कुलिङ्गस्तां तथाऽऽपन्नां निरीक्ष्य भृशदुःखितः।
स्नेहादकल्पः कृपणः कृपणां पर्यदेवयत्॥ ५२
कालवश वह जालके फंदोंमें फँस गयी। नर पक्षीको अपनी मादाकी विपत्तिको देखकर बड़ा दुःख हुआ। वह बेचारा उसे छुड़ा तो सकता न था, स्नेहसे उस बेचारीके लिये विलाप करने लगा॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 817) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/2/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)