श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.48

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

वितथाभिनिवेशोऽयं यद् गुणेष्वर्थदृग्वचः।

यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा॥ ४८

vitathābhiniveśo'yaṃ yad guṇeṣvarthadṛgvacaḥ|

yathā manorathaḥ svapnaḥ sarvamaindriyakaṃ mṛṣā|| 48

अर्थ

प्रकृतिके गुणों और उनसे बनी हुई वस्तुओंको सत्य समझना अथवा कहना झूठमूठका दुराग्रह है। मनोरथके समयकी कल्पित और स्वप्नके समयकी दीख पड़नेवाली वस्तुओंके समान इन्द्रियोंके द्वारा जो कुछ ग्रहण किया जाता है, सब मिथ्या है॥ ४८॥✎ 1860

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1860 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४ ७॥ → ४७॥

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