॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.2.46
भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः।
भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा॥ ४६
bhūtendriyamanoliṅgān dehānuccāvacān vibhuḥ|
bhajatyutsṛjati hyanyastaccāpi svena tejasā|| 46
अर्थ
यद्यपि वह परिच्छिन्न नहीं है, व्यापक है—फिर भी पंचभूत, इन्द्रिय और मनसे युक्त नीचे-ऊँचे (देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) शरीरोंको ग्रहण करता और अपने विवेकबलसे मुक्त भी हो जाता है। वास्तवमें वह इन सबसे अलग है॥ ४६॥✎ 1860