श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.34

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

त्वया कृतज्ञेन वयं महीपते

कथं विना स्याम सुहृत्तमेन ते।

तत्रानुयानं तव वीर पादयोः

शुश्रूषतीनां दिश२ यत्र यास्यसि॥ ३४

tvayā kṛtajñena vayaṃ mahīpate

kathaṃ vinā syāma suhṛttamena te|

tatrānuyānaṃ tava vīra pādayoḥ

śuśrūṣatīnāṃ diśa yatra yāsyasi|| 34

अर्थ

पतिदेव! आप हमसे बड़ा प्रेम करते थे, हमारी थोड़ी-सी सेवाको भी बड़ी करके मानते थे। हाय! अब आपके बिना हम कैसे रह सकेंगी। हम आपके चरणोंकी चेरी हैं। वीरवर! आप जहाँ जा रहे हैं, वहीं चलनेकी हमें भी आज्ञा दीजिये’॥ ३४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—दिशि।

    (मुद्रित पृष्ठ 814)

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