श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.30

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

प्रकीर्णकेशं ध्वस्ताक्षं रभसा दष्टदच्छदम्।

रजः कुण्ठमुखाम्भोजं छिन्‍नायुधभुजं मृधे॥ ३०

prakīrṇakeśaṃ dhvastākṣaṃ rabhasā daṣṭadacchadam|

rajaḥ kuṇṭhamukhāmbhojaṃ chinnāyudhabhujaṃ mṛdhe|| 30

अर्थ

उसका जड़ाऊ कवच छिन्‍न-भिन्‍न हो गया था। गहने और मालाएँ तहस-नहस हो गयी थीं। बाणोंकी मारसे कलेजा फट गया था। शरीर खूनसे लथपथ था। बाल बिखर गये थे। आँखें धँस गयी थीं। क्रोधके मारे दाँतोंसे उसके होठ दबे हुए थे। कमलके समान मुख धूलसे ढक गया था। युद्धमें उसके शस्त्र और बाँहें कट गयी थीं॥ २९-३०॥

यह अर्थ श्लोक 29–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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