श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.21

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भूतानामिह संवासः प्रपायामिव सुव्रते।

दैवेनैकत्र नीतानामुन्‍नीतानां स्वकर्मभिः॥ २१

bhūtānāmiha saṃvāsaḥ prapāyāmiva suvrate|

daivenaikatra nītānāmunnītānāṃ svakarmabhiḥ|| 21

अर्थ

देवि! जैसे प्याऊपर बहुत-से लोग इकट्ठे हो जाते हैं, परन्तु उनका मिलना-जुलना थोड़ी देरके लिये ही होता है—वैसे ही अपने कर्मोंके फेरसे दैववश जीव भी मिलते और बिछुड़ते हैं॥ २१॥

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