॥ श्रीहरिः ॥
केचित्खनित्रैर्बिभिदुः सेतुप्राकारगोपुरान्।
आजीव्यांश्चिच्छिदुर्वृक्षान् केचित्परशुपाणयः।
प्रादहन् शरणान्यन्ये प्रजानां ज्वलितोल्मुकैः॥ १५
kecitkhanitrairbibhiduḥ setuprākāragopurān|
ājīvyāṃścicchidurvṛkṣān kecitparaśupāṇayaḥ|
prādahan śaraṇānyanye prajānāṃ jvalitolmukaiḥ|| 15
अर्थ
कुछ दैत्योंने खोदनेके शस्त्रोंसे बड़े-बड़े पुल, परकोटे और नगरके फाटकोंको तोड़-फोड़ डाला तथा दूसरोंने कुल्हाड़ियोंसे फले-फूले, हरे-भरे पेड़ काट डाले। कुछ दैत्योंने जलती हुई लकड़ियोंसे लोगोंके घर जला दिये॥ १५॥✎ 2017 2018
केचित्खनित्रैर्बिभिदुः सेतुप्राकारगोपुरान्।
आजीव्यांश्चिच्छिदुर्वृक्षान् केचित्परशुपाणयः।
प्रादहन् शरणान्यन्ये प्रजानां ज्वलितोल्मुकैः॥ १५
कुछ दैत्योंने खोदनेके शस्त्रोंसे बड़े-बड़े पुल, परकोटे और नगरके फाटकोंको तोड़-फोड़ डाला तथा दूसरोंने कुल्हाड़ियोंसे फले-फूले, हरे-भरे पेड़ काट डाले। कुछ दैत्योंने जलती हुई लकड़ियोंसे लोगोंके घर जला दिये॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 812) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/2/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #2017 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
- #2018 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि