दैत्य तो स्वभावसे ही लोगोंको सताकर सुखी होते हैं। दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी आज्ञा उन्होंने बड़े आदरसे सिर झुकाकर स्वीकार की और उसीके अनुसार जनताका नाश करने लगे॥ १३॥
इति ते भर्तृनिर्देशमादाय शिरसाऽऽदृताः।
तथा प्रजानां कदनं विदधुः कदनप्रियाः॥ १३
दैत्य तो स्वभावसे ही लोगोंको सताकर सुखी होते हैं। दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी आज्ञा उन्होंने बड़े आदरसे सिर झुकाकर स्वीकार की और उसीके अनुसार जनताका नाश करने लगे॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.2.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 812) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/2/13/