॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.15.62
भावाद्वैतं क्रियाद्वैतं द्रव्याद्वैतं तथाऽऽत्मनः।
वर्तयन्स्वानुभूत्येह त्रीन्स्वप्नान्धुनुते मुनिः॥ ६२
bhāvādvaitaṃ kriyādvaitaṃ dravyādvaitaṃ tathā''tmanaḥ|
vartayansvānubhūtyeha trīnsvapnāndhunute muniḥ|| 62
अर्थ
जो विचारशील पुरुष स्वानुभूतिसे आत्माके त्रिविध अद्वैतका साक्षात्कार करते हैं—वे जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और द्रष्टा, दर्शन तथा दृश्यके भेदरूप स्वप्नको मिटा देते हैं। ये अद्वैत तीन प्रकारके हैं—भावाद्वैत, क्रियाद्वैत और द्रव्याद्वैत॥ ६२॥