श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.60

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना।

न स्युर्ह्यसत्यवयविन्यसन्‍नवयवोऽन्ततः॥ ६०

dhātavo'vayavitvācca tanmātrāvayavairvinā|

na syurhyasatyavayavinyasannavayavo'ntataḥ|| 60

अर्थ

इसी प्रकार शरीरके कारणरूप पंचभूत भी अवयवी होनेके कारण अपने अवयवों—सूक्ष्मभूतोंसे भिन्‍न नहीं हैं, अवयवरूप ही हैं। जब बहुत खोज-बीन करनेपर भी अवयवोंके अतिरिक्त अवयवीका अस्तित्व नहीं मिलता—वह असत् ही सिद्ध होता है, तब अपने-आप ही यह सिद्ध हो जाता है कि ये अवयव भी असत्य ही हैं॥ ६०॥✎ 1998

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1998 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): भोगरूपसे → भोग्यरूपसे

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