श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.58

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

आबाधितोऽपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृतः।

दुर्घटत्वादैन्द्रियकं तद्वदर्थविकल्पितम्॥ ५८

ābādhito'pi hyābhāso yathā vastutayā smṛtaḥ|

durghaṭatvādaindriyakaṃ tadvadarthavikalpitam|| 58

अर्थ

दर्पण आदिमें दीख पड़नेवाला प्रतिबिम्ब विचार और युक्तिसे बाधित है, उसका उनमें अस्तित्व है नहीं; फिर भी वस्तुके रूपमें तो वह दीखता ही है। वैसे ही इन्द्रियोंके द्वारा दीखनेवाला वस्तुओंका भेद-भाव भी विचार, युक्ति और आत्मानुभवसे असम्भव होनेके कारण वस्तुतः न होनेपर भी सत्य-सा प्रतीत होता है॥ ५८॥✎ 1998

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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