ये पितृयान और देवयान दोनों ही वेदोक्त मार्ग हैं। जो शास्त्रीय दृष्टिसे इन्हें तत्त्वतः जान लेता है, वह शरीरमें स्थित रहता हुआ भी मोहित नहीं होता॥ ५६॥
य एते पितृदेवानामयने वेदनिर्मिते।
शास्त्रेण चक्षुषा वेद जनस्थोऽपि न मुह्यति॥ ५६
ये पितृयान और देवयान दोनों ही वेदोक्त मार्ग हैं। जो शास्त्रीय दृष्टिसे इन्हें तत्त्वतः जान लेता है, वह शरीरमें स्थित रहता हुआ भी मोहित नहीं होता॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 900) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/15/56/