श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.37

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यैः स्वदेहः स्मृतो नात्मा मर्त्यो विट्कृमिभस्मसात्।

त एनमात्मसात्कृत्वा श्लाघयन्ति ह्यसत्तमाः॥ ३७

yaiḥ svadehaḥ smṛto nātmā martyo viṭkṛmibhasmasāt|

ta enamātmasātkṛtvā ślāghayanti hyasattamāḥ|| 37

अर्थ

जिन्होंने अपने शरीरको अनात्मा, मृत्युग्रस्त और विष्ठा, कृमि एवं राख समझ लिया था—वे ही मूढ़ फिर उसे आत्मा मानकर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं॥ ३७॥

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