जब साधक निरन्तर इस प्रकारका अभ्यास करता है, तब ईंधनके बिना जैसे अग्नि बुझ जाती है, वैसे ही थोड़े समयमें उसका चित्त शान्त हो जाता है॥ ३४॥
एवमभ्यसतश्चित्तं कालेनाल्पीयसा यतेः।
अनिशं तस्य निर्वाणं यात्यनिन्धनवह्निवत्॥ ३४
जब साधक निरन्तर इस प्रकारका अभ्यास करता है, तब ईंधनके बिना जैसे अग्नि बुझ जाती है, वैसे ही थोड़े समयमें उसका चित्त शान्त हो जाता है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 897) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/15/34/