देवकार्यमें दो और पितृकार्यमें तीन अथवा दोनोंमें एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। अत्यन्त धनी होनेपर भी श्राद्धकर्ममें अधिक विस्तार नहीं करना चाहिये॥ ३॥✎ 645
द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा।
भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि श्राद्धे कुर्यान्न विस्तरम्॥ ३
देवकार्यमें दो और पितृकार्यमें तीन अथवा दोनोंमें एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। अत्यन्त धनी होनेपर भी श्राद्धकर्ममें अधिक विस्तार नहीं करना चाहिये॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 894) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/15/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)