pātraṃ tvatra niruktaṃ vai kavibhiḥ pātravittamaiḥ|
harirevaika urvīśa yanmayaṃ vai carācaram|| 34
अर्थ
युधिष्ठिर! पात्रनिर्णयके प्रसंगमें पात्रके गुणोंको जाननेवाले विवेकी पुरुषोंने एकमात्र भगवान्को ही सत्पात्र बतलाया है। यह चराचर जगत् उन्हींका स्वरूप है॥ ३४॥✎ 642
पात्रं त्वत्र निरुक्तं वै कविभिः पात्रवित्तमैः।
हरिरेवैक उर्वीश यन्मयं वै चराचरम्॥ ३४
युधिष्ठिर! पात्रनिर्णयके प्रसंगमें पात्रके गुणोंको जाननेवाले विवेकी पुरुषोंने एकमात्र भगवान्को ही सत्पात्र बतलाया है। यह चराचर जगत् उन्हींका स्वरूप है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.14.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 892) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/14/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)