श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.34

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

पात्रं त्वत्र निरुक्तं वै कविभिः पात्रवित्तमैः।

हरिरेवैक उर्वीश यन्मयं वै चराचरम्॥ ३४

pātraṃ tvatra niruktaṃ vai kavibhiḥ pātravittamaiḥ|

harirevaika urvīśa yanmayaṃ vai carācaram|| 34

अर्थ

युधिष्ठिर! पात्रनिर्णयके प्रसंगमें पात्रके गुणोंको जाननेवाले विवेकी पुरुषोंने एकमात्र भगवान्‌को ही सत्पात्र बतलाया है। यह चराचर जगत् उन्हींका स्वरूप है॥ ३४॥✎ 642

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #642 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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