नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहे और गृहस्थधर्मके अनुसार सब काम करे, परन्तु उन्हें भगवान्के प्रति समर्पित कर दे और बड़े-बड़े संत-महात्माओंकी सेवा भी करे॥ २॥
गृहेष्ववस्थितो राजन्क्रियाः कुर्वन्गृहोचिताः।
वासुदेवार्पणं साक्षादुपासीत महामुनीन्॥ २
नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहे और गृहस्थधर्मके अनुसार सब काम करे, परन्तु उन्हें भगवान्के प्रति समर्पित कर दे और बड़े-बड़े संत-महात्माओंकी सेवा भी करे॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.14.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 889) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/14/2/