श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.2

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

नारद उवाच

गृहेष्ववस्थितो राजन्क्रियाः कुर्वन्गृहोचिताः।

वासुदेवार्पणं साक्षादुपासीत महामुनीन्॥ २

gṛheṣvavasthito rājankriyāḥ kurvangṛhocitāḥ|

vāsudevārpaṇaṃ sākṣādupāsīta mahāmunīn|| 2

अर्थ

नारदजीने कहा—युधिष्ठिर! मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहे और गृहस्थधर्मके अनुसार सब काम करे, परन्तु उन्हें भगवान्‌के प्रति समर्पित कर दे और बड़े-बड़े संत-महात्माओंकी सेवा भी करे॥ २॥

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